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आजादी के दीवाने भगत सिंह का प्रेरणादायक जीवन चरित्र

लेखक– देशराज शर्मा

महान क्रांतिकारी देशभक्त शहीद भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बावली गाँव में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है, भगत सिंह ने अपने 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन के थोड़े से जीवन में अंग्रेजो की नीव हिलाकर रख दी थी, उनके विचार और कार्य इस कदर महान थे, कि इतनी छोटी सी उम्र में ही भगत सिंह सबके आदर्श बन गए और मानवता के लिए देश भक्ति के मायने बदल कर रख दिए, उनके द्वारा किये गए कार्यो को आज तक बड़े सम्मान से साथ याद किया जाता है, भगत सिंह अपने चाचा अजित सिंह जो स्वतंत्रता सेनानी थे, और पिता किशन सिंह से बचपन से ही अंग्रेजी सरकार की बर्बरता के किस्से सुनते आए थे, भगत सिंह का बस एक ही सपना था, “आज़ादीऔर ऐसा लगता था, कि भगत सिंह अपनी मातृभूमि को अंग्रेज़ो से आजाद कराने के लिए ही साँसे ले रहे थे,

 

भगत सिंह जब लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए कर रहे थे, तभी उनके अन्दर देश प्रेम और मातृभूमि के प्रति कर्तव्य की भावना ने उन्हें पढ़ाई छुड़वा कर देश की आज़ादी के पथ पर ला खड़ा कर दिया था ,भगत सिंह के घर वाले उनकी शादी की सोच रहे थे, लेकिन भगत सिंह ने मना कर दिया, और कहा कि अगर मै आजदी से पहले शादी करूं तो मेरी दुल्हन मौत होगीभगत सिंह बहुत अच्छे लेखक थे, उनके लेख देश प्रेम से ओत प्रोत होते थे, जो लोगो में देश प्रेम जगाने का काम करते थे,

भगत सिंह का क्रन्तिकारी जीवन

भगत सिंह का पूरा जीवन ही क्रांतिकारी रहा, देशभक्तो के घर में जन्म लेने के कारण देशभक्ति उनमे जन्म से ही भरी थी, वह अंग्रेजो द्वारा भारतीयों पर किये जाने वाले अत्याचारों से बहुत आक्रोशित थे, जलियाँ वाला हत्याकांड के मनहूस दिन 13 अप्रैल 1919 की घटना ने भगत सिंह को झकझोर कर रख दिया, जहां 10-15 हजार निहथे लोगो पर जर्नल डायर ने बड़े ही बर्बरतापूर्ण तरिके से 1,650 राउंड गोलियां चलवा दी, जिसमे हजारो निर्दोष लोगो की लाशो से पूरा बाग भर गया, इस समय भगत सिंह की उम्र महज 12 वर्ष की थी, घटना की जानकारी पर भगत सिंह जलियांवाले बाग में 12 किलोमीटर पैदल भागकर पहुंच गए, और वहां पर लोगो की निर्मम हत्या से भगत सिंह बहुत आहत हुए,

भगत सिंह महात्मा गाँधी को तो बहुत मानते थे लेकिन उनके अहिंसात्मक विचारो को नहीं मानते थे, उनका मानना था की स्वतंत्रता पाने के लिए हिंसक होना बहोत जरुरी है, 5 फ़रवरी 1922 को भारतीयों द्वारा चौरीचौरा नामक घटना के बाद महात्मा गाँधी ने अपना असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया, जिसमें भगत सिंह गाँधी जी के इस फैसले से असंतुष्ट थे, (चौरी चौरा में लोगो द्वारा पुलिस चौकी को आग लगा दी गयी थी, जिसमे 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे) इसके बाद भगत सिंह ने हिंसा वादी विचार को अपना लिया और कई क्रांतिकारी दलों के सदस्य बन गए, और अंग्रेजो के खिलाफ जलूसों में भाग लेना शुरू कर दिया,


9 अगस्त 1925 को स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा रेल से ले जाये जा रहे सरकारी खजाने को लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन से लूट लिया गया, जिसे काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है, काकोरी काण्ड में 4 क्रान्तिकारियों को मौत की सजा तथा 16 अन्य को सजा सुनाई गयी जिसमे कुछ को काला पानी दिया गया, इस खबर से भगत सिंह इतने उद्विग्न हुए कि उन्होंने 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन दिया ।
-1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये प्रदर्शन किये गए, जिन प्रदर्शनों मे भाग ले रहे लाला लाजपत राय की अंग्रेजो की लाठी लगने से मृत्यु हो गयी। इससे आहत भगत सिंह ने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना बना डाली । 17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, एएसपी सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली उसके सिर में मारी, जिसके बाद भगत सिंह ने 3-4 गोलीयां मारकर उसे मौत के घाट उतारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया।

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधान सभा सत्र के दौरान विधान सभा भवन में बिना किसी को नुकशान पहुंचाए सभा के बीच में खली जगह पर बम फेंका, बम फटने के बाद उन्होंने नारा लगाया “इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!” और वहीं खड़े रहकर जानबूझ कर अपनी गिरफ़्तारी दे दी, सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने बचाव पक्ष के वकील को नियुक्त करने से भी मना कर दिया। जेल में उन्होंने जेल अधिकारियों द्वारा साथी राजनैतिक कैदियों पर हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध भूख हड़ताल की, और 64 दिन तक भूख हड़ताल जारी रखी, जिसमे “यतीन्द्रनाथ दास” क्रन्तिकारी की भूख से मौत हो गई, जिसके बाद अंग्रेजो को उनके आगे घुटने टेकने पड़े

इसके बाद 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुख देव और राज गुरु को मौत की सजा सुनाई गयी, भारत के तमाम राजनैतिक नेताओं द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों के बावजूद 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 :33 पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई. तीनों ने हँसते-हँसते देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया.


फाँसी के बाद हिस्दुस्तान में हिंसा भड़कने के डर से अंग्रेजो ने अंग्रेजो ने इनके शवो को काटकर बोरियो में भर दिया और फिरोजपुर के पास जलाने लगे, लेकिन आग को देखकर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए इससे डरकर वह उनके शवों को सतलुज नदी में फेक कर भाग गए, इसके बाद गांव वालो ने उनके शवों को इकठा कर उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया गया । इसी के साथ भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये.

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