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रामायण में बताई गयी है दुष्ट लोगो कि पहचान, इनसे हमेशा दूर रहें

 

जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो  प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥

 

नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसी का नाश करता है।  नीच आदमी धुए कि भांति होता है,  जैसे   आग से उत्पन्न हुआ धुआँ मेघ की पदवी पाकर सबसे पहले उसी अग्नि को बुझा देता है॥ उसी प्रकार नीच (दुष्ट आदमी) जिससे बडाइ पाता है,  बड़ा बनने पर सबसे पहले  उसी को नष्ट कर देता है,
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥

दुष्ट लोग सन (जिससे रस्सी बनाई जाती है)  कि भांति होते है, जैसे सन को पथरो पर मार मार कर उसकी खाल निकाल दी जाती है , इतनी विपत्ति(कष्ट) सहने पर भी वह रस्सी बनकर दुसरो को बांधने का ही काम करती है, इसी प्रकार दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को कष्ट में डालने के लिए स्वयं अपनी चाहे खाल (चमड़ी ) भी उतर जाए   लेकिन   दुसरो को बंधन में डालने के लिए वह सब  सह लेते है,

इन दुष्ट लोगो का स्वभाव बडा ही विचित्र होता है, यह दुष्ट लोग  बिना ही किसी स्वार्थ के साँप और चूहे  कि भांति    अकारण ही दूसरों का  बुरा करते रहते  हैं॥

पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥
 दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥

 ये लोग दुसरो कि संपत्ति का नाश करके स्वयं भी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं ।

इन दुष्टों का उदय   जगत में  प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय  के समान जगत को  दुःख देने  के लिए ही होता है,

नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥

 

शिव भगवान पार्वती से कह रहे हैं, कि नीच (दुष्ट प्राणी ) का झुकना भी फलस्वरूप  उसी प्रकार दुःख को देने वाला   होता है। जैसे अंकुश (अंकुश के झुकने से हाथी को महान पीड़ा होती है ), धनुष, साँप (सांप डंक मारने के लिये झुकता है ) और बिल्ली का झुकना अनिष्ट को ही दर्शाने वाला होता है ।

दुष्ट लोगो की मीठी वाणी भी उसी तरह  भय देने वाली होती है, जैसे वृक्ष में बिना ऋतु के फूल (जो अनिष्ट कि सुचना देते है) ॥

 

खलन्ह हृदयॅ अति ताप विसेसी । जरहिं सदा पर सम्पति  देखी।
जहॅ कहॅु निंदा सुनहि पराई । हरसहिं मनहूँ  परी निधि पाई ॥

इन दुष्ट मनुष्यों  के हृदय में अत्यधिक संताप(पीड़ा चिंता) रहता है। ये  दुसरों को सुख में  देखकर सदा  जलन का  अनुभव करते रहते हैं। और दुसरों की बुराई सुनकर  इस प्रकार  खुश होते हैं, जैसे कि रास्ते में गिरा हुआ खजाना उन्हें मिल गया हो।

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा, बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।

 कवि कोविद गावहिं असि नीती, खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।

उदासीन नित रहिअ गोसाई, खल परिहरिअ स्वान की नाई।

काकभसुंडी जी गरुड जी से कहते हैं, कि  बुद्धिमान मनुष्य  इन बातो को समझकर नीच  की संगति नही करते,

कवि एवं पंडित लोग  नीति बताते हैं  कि  दुष्ट  से न तो  झगड़ा अच्छा है न हीं प्रेम।

इन दुष्टों से सदा  उदासीन कि भांति ही  रहना चाहिये। और दुष्ट  को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये।(जैसे कि कुता प्यार करने पर चाट लेता है और गुस्सा आने पर काट लेता है,) इसी प्रकार दुष्टों को दूर से ही  त्याग देना चाहिए, क्योकि यह बुरे के लिए ही पैदा होते है,

(यह सब मैंने इन लोगो से आपको  घृणा करने के लिए नही लिखा, बल्कि इन्हें  पहचान कर इनसे बचने  के लिए मैंने रामायण कि कुछ पंक्तियों का समूह आपके समक्ष प्रस्तुत किया )

पंडित देशराज शर्मा द्वारा अनुवादित

 

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