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भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार, नये युग का आरम्भ

भगवान विष्णु जी ने सृष्टि  में धर्म व मानवता कि रक्षा के लिए  24 अवतार ग्रहण किये, इन 24 अवतारों में से मुख्य 10 अवतारों में भगवान का मत्स्य अवतार प्रथम अवतार माना जाता है ,

सतयुग में सत्यव्रत मनु नाम का एक राजा हुए, जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे | इन्होने भगवान कि हजारो वर्षो तक घोर तपस्या की , वह समय सृष्टि के  अंत का था जब सृष्टि में प्रलय आने वाला था, ( भगवान व्रह्मा के दिन में सृष्टि कि रचना तथा रात में प्रलय होता है ब्रह्मा का एक दिन 4 320 000 000 वर्षो का होता है, तथा इतनी ही रात होती है )

एक दिन राजा  मनु सुवह ही सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नदी के निकट गये और जैसे ही मनु  ने भगवान कि प्रार्थना कर हाथो में लिए जल कि अर्घ्य देने लगे कि उस जल में से एक छोटी से मछली कि आवाज आयी  “हे  राजन , मुझे   नदी में मत प्रवाहित ,

करो ” इस नदी के बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे, मनु को इस पर दया आ गयी और वह उसे अपने कमंडल में डाल कर अपने घर ले आए

लेकिन देखते ही देखते मछली बड़ी हो गयी और खुद को किसी बड़े पात्र में रखने के लिए राजा से प्रार्थना करने लगी, राजा ने शीघ्र ही बड़ा पात्र लेकर मछली को उसमे डाल दिया लेकिन देखते ही देखते यह पात्र भी उसके लिए छोटा पड गया, राजा मनु यह देख आश्चर्य चकित थे, और उन्होंने और बड़ा पात्र लेकर उसमे मछली को डाल दिया, लगातार बड़ते रूप को देखकर मनु ने मछली को तालाब में डाल दिया,  लेकिन कुछ ही समय में मछली के विशाल रूप ने पुरे तालाब को ढक लिया इस पर राजा मनु समझ गये कि यह मछली कोई साधारण नही है, अपितु भगवान नारायण का ही रुप है, उन्होंने उस मछली के लगातार  बड़े हो रहे तथा नदियों के रूप को उसके आगे छोटा  देखकर उसके लिए समुद्र को ही सही स्थान समझ कर उसे समुद्र में डाल दिया,

समुद्र में पहुंचकर विशाल  रूप धारण करते हुए उस मछली  ने  अपनी  पहचान  बताते हुए मनु को  बताया कि आज से सात दिन के बाद प्रलय आएगा जिसमे पुरा  विश्व जल मग्न हो  जाएगा,तत्पश्चात सृष्टि का दोवारा  सृजन  होगा,  उन्होंने  राजा सत्यव्रत को सभी जड़ी-बूटियों के बीजो को तथा समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीरो को इकठा करने का आदेश दिया और बताया कि प्रलय के समय के लिए तुम  विशाल काय नाव  बनाओ  जिसमे   सप्त ऋषियों  को लेकर तथा समस्त बीजो को लेकर उसमे आपने बैठ जाना, जब वह नाव पानी में डगमगाने लगेगी तब मै एक सींग वाला मत्स्य आपके पास आऊंगा, आपने वासुकी नाग के साथ उस नौका को मेरे सींग से बांध देना, मै व्रह्मा कि रात तक (प्रलय काल के समय तक) उस नौका को खिचता रहूँगा, और आपके प्रश्नों के उत्तर दूंगा, तब तक आप मेरा बताया हुआ कार्य करो,  इतना कह कर  मछली  चली  गई।

भगवान के बताए अनुशार धरती पर कुछ समय बाद भारी वारिश होने लगी, भगवान मनु उस नौका में सप्त ऋषियों और समस्त सूक्षम जीवो के साथ सवार हो गये, जब उनकी नाव उस प्रलय में डगमगाने लगी तब वहां एक सींग वाले मत्स्य भगवान आए, राजा ने मछली के सींग के साथ नौका को बांध दिया,

मछली ने  प्रलय काल के समय तक नौका को सुरक्षित रखा, और समस्त प्राणियों के साथ राजा मनु को वेदों  का ज्ञान कराया,  प्रलय  के समाप्त होने पर मछली ने नौका को हिमवन पर्वत पर छोड़ दिया और  वहीं  से नौका पर सवार प्राणियों ने पुनः नये युग का आरम्भ किया |

यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान या वैवस्वत (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए, वही वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।

पंडित देशराज शर्मा द्वारा लिखित

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